Sunshine

When the words become gibberish,
And you don’t know what to write,
When the convictions turn dizzy,
And you start loosing the fight.

When the head turns heavy,
And there is pain behind the eyes.
When you’re lying motionless,
With no one to witness your cries.

When there is no hope and respite,
And just despair clouding the skyline.
When the last wish is to hold you,
And yearning for you my sunshine.

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Imperfect Respect

We have lost respect for you, they say.

Why, i asked?

You seemed perfect back then but aren’t now, they say

I may be imperfect but who isn’t?

The world is full of imperfections.

How do some people seem perfect then?

There is just a semblance of perfection until you get close enough.

How do we love people with so much imperfections then?

“Love is all about coping up with those imperfections with paitence”, i said.

Pain

Hurt me more,i wallowed in self pity
And I don’t care for it’s nitty gritty
I just care for the pain that it derives
powers my writings and fills my kitty

That Mr. Pride who you badly smother
Ohh, i love it baby,its creative fodder
I just care for the pain it derives
For, Mr. Pride too is that selfish other.

ਵਾਅਦੇ

ਕਰ ਵਾਅਦੇ ਮੁਕਰ ਜਾਣਾ ਤਾਂ ਤੇਰੀ ਆਦਤ ਮੁੱਢ ਤੋਂ ਸੀ,
ਮੈ ਫੇਰ ਵੀ ਕਾਤੋਂ ਕਰ ਤੇਰੇ ਤੇ ਯਕੀਨ ਬਹਿ ਗਿਆ ਨੀ|

ਮੇਰੇ ਦਿਲ ਦੇ ਟੋਟੇ ਕਰਨਾ ਤਾਂ ਤੇਰੀ ਫਿਤਰਤ ਦੇ ਵਿਚ ਹੀ ਸੀ
ਮੈ ਫੇਰ ਵੀ ਚੰਦਰਾ ਰਾਹਾਂ ਚ ਦਿਲ ਵਿਛਾ ਕੇ ਬਹਿ ਗਿਆ ਨੀ|

दिल्ली

दिल्ली के प्रेमी कई थे,हैं और आएंगे भी,
बरसों से आ रहे कुछ जीतने कुछ लूटने,
मोहब्ब्त हमें भी थी मगर दिल्ली से नहीं,
पर दिल्ली से वाकिफ करवाया था जिसने,
थी वो जान मेरी थी मोहब्ब्त वही।

उसके आने से पहले पराई सी जो लगती थी,
अब अपनी सी लगती थी दिल्ली वही,
जिसकी मुस्कुराहट से जगमगा उठती थी दिल्ली,
था अंबर में जलता दीप मैं उसका,
थी दीप की एक आरुषि वही।

पर समय की करवट को खुशी मेरी खलने सी लगी,
बड़े शहरों में रहने वाली थी जो वो,
आज छोटे से दिल की निकली वही,
कभी दिल से दूर रही थी जो दिल्ली,
दूर जाने से उसके पास आ गई अभी,

उसके जाने से मिट गए थे हम में फांसले,
हमें तन्हा सा छोड़ चली गई थी बंबई,
सुना है कि अब भी कभी कभी,
दिखती हैं वो उन्हीं रास्तों पे चलती हुई,
बस फर्क इतना है कि,
दिल्ली अब भी वही है पर वो वोह न रही।।

कविता अधूरी

मैं अधूरा, मेरे लफ्ज़ अधूरे,

मेरे लेख अधूरे, कविता अधूरी,

काम अधूरे, और लकक्ष अधूरे,

कुछ कमी सी है जो करनी है पूरी,

करनी है पूरी वो कविता अधूरी,

बीच रास्ते में जिसे छोड़ा था मैंने,

रहा मैं भी अधूरा रही वो भी अधूरी,

अधूरा छूट गया है वो सफा जिंदगी का,

कुछ लफ्ज़ तो लिखे हैं पर कविता अभी अधूरी।।

संघर्ष

खुद को ढूंढने निकला था रसते पे,
पर लाखों की भीड़ में खोता सा जा रहा हूं,
मैं गिरता हूं बार बार,मायूस भी होता हूं,
कांटों पर लड़खड़ा रहा हूं,
पर चलता मैं जा रहा हूं।

कुछ साथी मिले हैं इस भीड़ में,
कुछ कंधा देने के काम आए,
कुछ के दिए ज़ख्म सहे जा रहा हूं,
मायूसी की ज्वाला में जलता मैं मैं जा रहा हूं,
वक़्त की मोम की तरह पिघलता मैं जा रहा हूं।

आखिर ख़तम ही नहीं हो रहा संघर्ष का ये दरिया,
कठिनाइयों की लहरें हैं, चुनौतियों के तूफान,
फिर भी डूबा नहीं हूं,संभलता मैं जा रहा हूं,
थक गया हूं और रुकना भी चाहता हूं,
पर चलता मैं जा रहा हूं, चलता मैं जा रहा हूं।।